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दो दिवसीय वेस्ट जोन वाइस चांसलर्स सम्मेलन संपन्न

राजस्थान विद्यापीठ की मेजबानी में “स्वदेशी, आर्थिक एवं तकनीकी राष्ट्रवाद” विषय पर आयोजित दो दिवसीय वेस्ट जोन वाइस चांसलर्स सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष डॉ. वासुदेव देवनानी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वेद और पुराण केवल आध्यात्मिक जागरण के साधन नहीं, बल्कि चेतना के वैज्ञानिक संकेतों के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक तकनीक के समन्वय से एक नए युग का उद्भव संभव है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि व्यक्ति अपनी क्षमताओं की पहचान कर शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर क्षमता विकास को अपनाए, तो निर्भरता से आत्मनिर्भरता की ओर एक सशक्त यात्रा संभव है।

उन्होंने विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान न बनकर स्वदेशी तकनीक और नवाचार की प्रयोगशालाओं के रूप में विकसित करने की आवश्यकता बताई। “मेक इन इंडिया” से आगे बढ़ते हुए “डिजाइन एंड डेवलप इन इंडिया” को अपनाने का आह्वान करते हुए उन्होंने शोध एवं विकास पर बल दिया। साथ ही, स्वज्ञान और प्रतिभा पर विश्वास रखते हुए समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला।

डॉ. देवनानी ने “लोकल फॉर वोकल” को आत्मनिर्भर भारत की नींव बताते हुए कहा कि इससे आर्थिक राष्ट्रवाद को मजबूती मिलेगी। उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा कि 2014 में 11वीं अर्थव्यवस्था से आज भारत विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुका है और शीघ्र ही तीसरे स्थान पर पहुंचेगा। उन्होंने भारत को महाशक्ति के बजाय “मार्गदर्शक” के रूप में स्थापित करने की भावना व्यक्त की।

विशिष्ट अतिथि, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति उसकी शिक्षा व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर निर्भर करती है। नई शिक्षा नीति को परिवर्तन का प्रभावी माध्यम बताते हुए उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा पद्धति में समाहित करने पर जोर दिया। एकात्म मानववाद और ग्रामीण स्वराज की अवधारणा के माध्यम से स्वावलंबी समाज निर्माण की दिशा में विश्वविद्यालयों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

डॉ. कोठारी ने आधारभूत बदलाव की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को पाठ्यक्रम और शिक्षा पद्धतियों में समाहित कर शिक्षा को अधिक समग्र और भारतीयता से परिपूर्ण बनाया जाना चाहिए। उन्होंने नागरिक निर्माण, स्वशासन, स्वभाषा, स्वभोज और स्वभूषा जैसे मूल्यों को जीवन में अपनाने पर जोर दिया और कहा कि इन सिद्धांतों को व्यवहार में लाने के प्रारंभिक प्रयासों को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर तक विस्तार देने की आवश्यकता है।

विशिष्ट अतिथि एवं भाजपा प्रबुद्धजन प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक राजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि भारत आज हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है, जिसका उदाहरण कोरोनाकाल में स्वदेशी दवाओं के विकास के रूप में देखा गया। आज हम शिक्षा, चिकित्सा से सेना में काम आने वाले उपकरणों के निर्माण में आत्मनिर्भर हुए है।

अतिथियों का स्वागत करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने स्वदेशी सोच, आर्थिक राष्ट्रवाद और तकनीकी आत्मनिर्भरता में शिक्षा एवं शिक्षकों की भूमिका पर प्रकाश डाला और कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पूर्ण क्रियान्वयन देश के विकास को नई दिशा देगा। उन्होंने विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के लिए अनुसंधान और नवाचार के समन्वय को आवश्यक बताया।

प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि स्वदेशी हमारे लिए केवल एक विचार नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का प्रतीक है, जिसे वर्तमान समय में और अधिक सशक्त करने की जरूरत है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बदलते समय के साथ स्थानीय उत्पादकों को बढ़ावा देते हुए आधुनिक तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधारभूत ढांचे, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे नवीन क्षेत्रों में कार्य करना समय की मांग है। इस दिशा में सतत प्रयास कर हम आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

एआईयू के अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पाठक एवं महासचिव डॉ. पंकज मित्तल ने आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी उत्पादों के उपयोग, पाठ्यक्रम में स्वदेशी को शामिल करने और अनुसंधान को स्वदेशी आधार देने की आवश्यकता पर बल दिया।

सम्मेलन के दौरान आयोजित तकनीकी सत्र “आर्थिक देशभक्ति से आर्थिक स्वदेशीकरण” में विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने आर्थिक राष्ट्रवाद, स्वदेशी उद्योगों और विश्वविद्यालयों की भूमिका पर गहन विचार-विमर्श किया। साथ ही एआईयू के बिजनेस सेशन में संगठन की भावी योजनाओं एवं गतिविधियों पर चर्चा की गई।

दो दिवसीय सम्मेलन में आयोजित “पोस्टर फॉर बेस्ट प्रैक्टिसेस” प्रतियोगिता में डॉ. डीवाई पाटिल डीम्ड विश्वविद्यालय, पुणे ने प्रथम, आईसी विश्वविद्यालय, जयपुर ने द्वितीय एवं जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। विजेता विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों को स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

रजिस्ट्रार डॉ. तरूण श्रीमाली ने प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए दो दिवसीय सम्मेलन की जानकारी दी।

आयोजन सचिव प्रो. युवराज सिंह राठौड़ ने बताया कि उदयपुर में पहली बार आयोजित इस सम्मेलन में महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना और राजस्थान से लगभग 150 कुलगुरुओं ने भाग लेकर आत्मनिर्भर भारत के विभिन्न आयामों पर मंथन किया।

यह सम्मेलन स्वदेशी, आर्थिक राष्ट्रवाद और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।

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